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देशज समाज के वाहक अनुपम जी का जाना

-गोपाल राम

आज सुबह जब ये समाचार मिला कि अनुपम मिश्र जी नहीं रहे तो तटस्थ नहीं रहा गया। कुछ समय मौन बैठकर उनके होने व न होने के बीच के फासले को तलाशता रहा। इस खोज में लगा कि अनुपम जी जैसे लोग मरते नहीं हैं बल्कि चोला बदलते हैं ताकि एक और नई ऊर्जा के साथ पुनः आकर अपना शेष काम सँभाल सकें। अनायास ही मुझे जीवन तो अमर है का गहरा अहसास छू गया। इस स्पर्श से मैं अनुपम जी की स्मृतियों की तरफ लौटा। (more)

एक और बड़े भाई चल दिये
रवीन्द्र कुमार पाठक
मगध जल जमात, गया, बिहार

श्री अनुपम मिश्र आज शरीर छोड़ कर दूसरी दुनिया का तमाशा देखने निकल लिये। इतना सक्रिय जीवन जीने वाले अनुपम भाई से जब पिछले साल के आरंभ में 3 जनवरी को मिला तो उन्होने जीवन की जगह मौत पर ही चर्चा केन्द्रित कर दी। मुझे थोड़ा अटपटा लगाए हमारी आम चर्चा के विषय से अलग. न पानीए न पर्यावरण न अन्य सामाजिक प्रश्न। वे गांधी जी की मौत की सार्थकता पर बोल रहे थे। मैंने भी बेमतलब का विनोबाजी वाला प्रसंग जोड़ दिया। (more)

[स्मृतिशेष] अलविदा अनुपम जी !

. उवेस सुल्तान ख़ान

आज अनुपम मिश्र जी की 69वीं की सालगिरह है। अनुपम जी साधरण जीवन जीने वाले ख़ास व्यक्ति थे, जो आज से तीन रोज़ पहले हमारे बीच से चले गए। अनुपम जी ”अनुपम” थे, इसके बावजूद अक्सर हम लोग उन्हें पानी, पर्यावरण या गांधीवाद की खिड़कियों से जानने की कोशिश करते रहे हैं। मैं अनुपम जी की परंपरा का व्यक्ति नहीं हूँ, पर बनने की चाह ज़रूर है दृ जिसमें खुद को फ़ना कर बक़ा हासिल होती है। यह इसलिए भी कह रहा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं अनुपम जी के बारे में जो लिखने की जुर्रत कर रहा हूँ, उसकी हैसियत मेरी नहीं है, वो इसलिए भी क्योंकि अनुपम जी की शैली में शिकायत किसी से नहीं होती, और मैं उस शैली में पारंगत नहीं हूँ और उसकी झलक मिलेगी, साथ ही मैंने अनुपम जी को पानी, पर्यावरण और गांधीवाद के दायरों से कभी नहीं जाना है, तो मुझे त्रुटियों के लिए माफ़ कीजियेगा।(more)

गांधी, विनोबा और जेपी के बाद अनुपम ही थे, जिन्हें समाज पर पूरा भरोसा था...

चिन्मय मिश्र

अनुपम जी का यूं पर्दा कर लेना बहुत भाया नहीं. उन्होंने जीवन में पहली बार कोई मनमानी की. मगर एक बार ऐसा करने का हक तो उन्हें भी है. हमेशा की तरह एक दिन उनका फोन आया. पहले पूछा ''भैया ! कैसे हो? सब ठीक है न! मैं अस्पताल से फोन कर रहा हूं. तकलीफ कुछ ज्यादा हो गई थी. डाक्टरों ने बताया है कि कैंसर है. कोई घबड़ाने की बात नहीं है. देखो, इसीलिए मैंने खुद फोन किया है. अपना काम करते रहना. हैं! परेशान मत होना. सरोज को स्नेह कहना. फिर फोन करूंगा. अच्छा रखता हूं." आसन्न मृत्यु को इतनी सहजता और शांति से ग्रहण करने वाले को क्या संज्ञा दी जा सकती है? तब तो कुछ नहीं सूझा. फोन हाथ में जम सा गया और आंखें सूख गईं. क्योंकि उनमें पानी लाने वाला अब डूब रहा था. मगर विश्वास था कि तूफान भी उनका हौसला तोड़ नहीं पाएगा क्योंकि उनकी तो नदी से दोस्ती है.(more)

"पर्यावरण का अनुपम, अनुपम मिश्र है, उसकी "पुण्याई" पर हम जैसे जी रहे हैं"

वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी

ये कागज़ मैं उन्हीं अनुपम मिश्र और उनके काम पर काले कर रहा हूं, जिनका जिक्र आपने इस जगह पर कई बार देखा और पढ़ा होगा. खतरा है कि आप में से कई लोग मुझ पर पक्षपात करने, यानी अपने ही लोगों में रेवड़ी बांटने जैसा अंधत्व होने का आरोप लगा सकते हैं, लेकिन इसलिए कि आप पर कोई आरोप लगा सकता है, आप वह करना और कहना छोड़ दें, जो आप को करने और कहने को प्रेरित कर रहा है, तो आपके होने-करने का मतलब क्या रह जाएगा?(more)

जेठ की दुपहरी में शीतल साये सा 'अनुपम' अहसास

पंकज शुक्ला

वह जेठ की तपती दोपहर थी. मई २००८ का वह दिन जीवनभर के लिए यादगार हो गया. उस अलसाई दुपहरी मेरा मोबाइल बजा. नंबर दिल्ली का था और लैंडलाइन से था. मैंने लगभग अनिच्छा से फोन रिसीव किया. दूसरी ओर से मीठी सी आवाज आई- 'भैया, अनुपम बोल रहा हूं.' यकीन मानिए, मरूथल की गर्म दुपहरी में शीतल साए की तरह लगी थी वह आवाज. मैं तो अनुपम जी के फोन आने के ही सुखद अहसास से बाहर नहीं निकल पा रहा था और वे लगातार मुझे चौंकाते जा रहे थे. वे कहते रहे और मैं धन्य–धन्य होता रहा.(more)

"जो समाज ने किया, उसे शब्दों में पिरोने वाला महज़ क्लर्क हूं मैं..."

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राकेश दीवान

अनुपम...! उन्होंने अपने नाम को सार्थक कर दिया... जैसा उनका नाम था, व्यक्तित्व भी उतना ही सुंदर और कृतित्व भी... अपने पिता, हिन्दी के ख्यात साहित्यकार-कवि भवानीप्रसाद मिश्र से उन्हें जो चीज़ विरासत में मिली थी, वह थी भाषा... उनके जैसी भाषा विरलों के पास होती है... यही वजह है, उनके द्बारा तालाबों पर लिखी गई किताबें किसी फिक्शन की तरह लगती हैं... अगर एक बार पढ़ना शुरू कर दो तो अंत तक छोड़ने का मन नहीं करता... उन्होंने तालाबों की कहानी इस तरह की भाषा में पिरोई है कि वह हर वर्ग को समझ तो आती ही है, उस दौर के समाज की उस समृद्ध विरासत से भी परिचित कराती है, जो हमारे पूर्वजों ने बहुत सोच-समझकर गढ़ी थी... ख्यात साहित्यकार अशोक बाजपेयी का भी यही मानना है कि अनुपम जैसी भाषा बहुत कम लोगों की होती है, इसलिए वह तथा अन्य साहित्कार अक्सर अनुपम को भी साहित्यिक आयोजनों में आग्रहपूर्वक ले जाते थे, जबकि उनका साहित्य से उस तरह का कोई
नाता नहीं था... (more)

जीवित आदर्श का साथ अचानक छूट जाना...

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सुधीरजैन

उनके लिए कोई उपमा नहीं सोची जा सकती. वह वाकई अनुपम थे. उनसे मेरी पहचान प्रभाष जोशी ने करवाई थी. दरअसल प्रभाष जी की इच्छा थी कि मैं सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के लिए भारतीय जल प्रबंधन पर शोध करूं और अपने शोध आलेख 'जनसत्ता' के संपादकीय पेज के लिए लिखूं. इसी सिलसिले में अनुपम जी से पहली मुलाकात हुई, और फिर उनसे राग हो गया.(more)

 

अनुपम मिश्र : खुद भी उतने खरे, जितने उनके तालाब...

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राकेशकुमारमालवीय

बचपन से जिन कुछ बातों पर हम गांव के दोस्त इतराते थे, उनमें एक यह कि हमारे गांव में एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी ने गुरुकुल 'सेवा सदन' स्थापित किया था, जिसे बचपन से 'सौराज' सुनते आए. बहुत बाद में समझ आया कि 'स्वराज' ही होते-होते 'सौराज' हो गया है. इसलिए, क्योंकि क्रांतिकारी यहां आज़ादी की गुप्त बैठकें किया करते थे.(more)

 

प्राइम टाइम इंट्रो : अनुपम मिश्र के बारे में आपको क्यों जानना चाहिए...

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रवीशकुमार

सोचा नहीं था कि जिनसे ज़िंदगी का रास्ता पूछता था, आज उन्हीं के ज़िंदगी से चले जाने की ख़बर लिखूंगा. जाने वाले को अगर ख़ुद कहने का मौका मिलता तो यही कहते कि अरे मैं कौन सा बड़ा शख़्स हूं कि मेरे जाने का शोक समाचार दुनिया को दिया जाए. ज़िद करने लगते कि रहने दो. जो काम मैंने किया है वो मेरा थोड़े न है. मैंने तो बस जो मौजूद था इस दुनिया में उसी को उठाकर एक पन्ने पर रख दिया है. उन्हें कोई न तो बता सकता था न इस बात के लिए तैयार कर सकता था कि उन्होंने कुछ किया है. इसीलिए वे हम सबके हीरो थे. एक हीरो वो होता है जिसे दुनिया जानती है, एक हीरो वो होता है जो इस दुनिया को जानता है. सोमवार की सुबह दिल्ली के एम्स अस्पताल में अनुपम मिश्र ने अंतिम सांस ली. वो अब नहीं हैं तो कम से कम आज ज़िद नहीं कर सकते कि उनके जाने की ख़बर दुनिया को न बताई जाए. कोशिश करूंगा कि उनके बारे में कम बताऊं और उनके काम के बारे में ज़्यादा. (more)

http://epaper.jansatta.com/ 1048192/Jansatta.com/25- December,-2016#page/16/1

Sustainable Strategies

We must think beyond fiscal stimuli in a resource-scarce world

Shyam Saran

http://www.business-standard.com/article/opinion/shyam-saran-sustainable-strategies-110011600005_1.html

Business Standard AND   pressreader.com

The Ecological Deficit

India is consuming beyond its means - in terms of natural resources, that is

Shyam Saran  

http://www.business-standard.com/article/opinion/shyam-saran-the-ecological-deficit-113021900832_1.html

Business Standard AND   pressreader.com

Budget disappoints on Ecological Sustainability

Shyam Saran

08 February 2017

https://www.pressreader.com/india/business-standard/20170208/281977492361631

Business Standard AND   pressreader.com .

 

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